“झारखंड माटी की आत्मा थे गुरुजी”, नारे-श्रद्धांजलि में डूबा झारखंड
रांची। झारखंड आंदोलन के महानायक, झामुमो संस्थापक व पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरु शिबू सोरेन का पार्थिव शरीर जैसे ही रांची स्थित मोरहाबादी आवास पहुंचा, हजारों समर्थकों की भीड़ उमड़ पड़ी। जनसैलाब उनके अंतिम दर्शन को टूट पड़ा। “गुरुजी अमर रहें” और “झारखंडी अस्मिता के प्रतीक को नमन” जैसे नारों से माहौल गूंज उठा।
भीड़ को संभालने के लिए पुलिस बल तैनात था, लेकिन जनभावनाओं की बाढ़ में हर व्यवस्था छोटी साबित हो रही थी। उनके सम्मान में फूलों की वर्षा की गई, छात्राओं ने श्रद्धांजलि दी, और हजारों बाइक सवारों ने नारे लगाते हुए उन्हें अंतिम विदाई दी।
“झारखंडी पहचान हमारी आत्मा है, और आत्मा को कोई मार नहीं सकता”, ये वो शब्द थे जो गुरुजी अक्सर दोहराया करते थे। उनका मानना था कि झारखंड केवल एक राज्य नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता, संस्कृति और संघर्ष की जीवित चेतना है। उन्होंने कहा था—
“हम झारखंड को जमीन से नहीं, आत्मा से देखते हैं। जब तक एक भी झारखंडी जिंदा है, तब तक लड़ाई जारी रहेगी।”
गुरुजी की जीवन-यात्रा: संघर्ष, सेवा और सिद्धांतों की मिसाल
1944: जन्म, नेमरा गांव, रामगढ़ (तब बिहार) , 1957: पिता सोबरन सोरेन की हत्या, जिससे सामाजिक और राजनीतिक जीवन की शुरुआत ,1973: झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना , 2000: झारखंड राज्य का गठन—उनके आंदोलन का नतीजा , 2005, 2008, 2009: तीन बार मुख्यमंत्री , 2020: राज्यसभा सांसद बने , 4 अगस्त 2025: दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में निधन ।
जन-जन के नेता थे गुरुजी
गुरुजी कहते थे नेता वह नहीं जो दिल्ली में कुर्सी पर बैठ जाए, नेता वह है जो गांव की चौपाल में बैठे बुजुर्ग की पीड़ा समझे। शायद यही कारण रहा कि अंतिम विदाई में झारखंड के हर तबके से लोग पहुंचे—नेता, अधिकारी, शिक्षक, छात्र, किसान और मजदूर। उनकी सोच थी जो मिट्टी से पैदा होता है, वही मिट्टी के लिए मरता है। मैं उसी मिट्टी का बेटा हूं।
नारी शक्ति और युवा पर विश्वास
शिबू सोरेन हमेशा महिलाओं और युवाओं को आंदोलन की रीढ़ मानते थे। उनका मानना था कि जब तक बेटी पढ़ेगी नहीं, तब तक समाज आगे नहीं बढ़ेगा। और जब तक युवा जागेगा नहीं, तब तक बदलाव नहीं आएगा।”
गुरुजी का पार्थिव शरीर जब मोरहाबादी स्थित आवास पहुंचा, तो हर आंख नम थी। सड़क किनारे खड़े लोग हाथों में फूल लिए इंतजार कर रहे थे। आदिवासी छात्राओं ने पुष्पवर्षा की, वहीं हजारों कार्यकर्ताओं ने बाइक जुलूस के साथ विदाई दी। बिरसा मुंडा एयरपोर्ट से लेकर आवास तक करीब 10 किमी का रास्ता श्रद्धांजलि की बारिश से भीग गया।
झारखंड के लोगों के दिलों में एक ही सवाल है । “गुरुजी नहीं रहे, लेकिन क्या उनके सपनों का झारखंड आगे बढ़ेगा? अब यह जिम्मेदारी झारखंड की जनता और नेतृत्व पर है कि गुरुजी के विचारों और संघर्ष को आगे ले जाए।