जनता की सेवा के लिए बने कार्यालय अब वसूली केंद्र बनते जा रहे हैं , क्या यही सुशासन है??
चतरा (संजीत मिश्रा)। चतरा जिले के सरकारी कार्यालयों में बेलगाम बाबुओं की तानाशाही और खुलेआम चल रही रिश्वतखोरी अब आम जनता के सब्र का इम्तिहान लेने लगी है। जिला मुख्यालय से लेकर सुदूर प्रखंड कार्यालयों तक की स्थिति यह हो गई है कि बिना ‘चढ़ावा’ चढ़ाए आम जनता का सरकारी कार्य या आवेदन भी स्वीकार नहीं किया जाता।
पेंशन हो या जाति प्रमाण पत्र, जन्म प्रमाण हो या आवास योजना की स्वीकृति , तालाब हो या सड़क निर्माण , दाखिल खारिज हो या अन्य कार्य हर जगह बाबुओं की जेब गर्म करने की अनिवार्यता बन चुकी है। खासकर गरीब, असहाय, वृद्ध, दिव्यांग और अशिक्षित वर्ग इस भ्रष्ट तंत्र के सबसे बड़े शिकार बन गए हैं।
दफ्तरों की चौखट पर चक्कर काट रही जनता की उम्मीदें हर बार बाबुओं की जेब में अटक जाती हैं। ऐसे में सवाल उठता है । क्या यही ‘सबका साथ, सबका विकास’ और ‘सुशासन’ का असली चेहरा है?
चिंताजनक बात यह है कि इन कार्यालयों में कई ऐसे भी अधिकारी हैं जो या तो इस स्थिति से अनजान बने हुए हैं या फिर जानबूझकर आंखें मूंदे हुए हैं। वहीं कुछ ईमानदार और कर्मठ अधिकारी जरूर हैं, जिन्होंने कर्मियों को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे अपनी कार्यशैली में सुधार लाएं और आमजन के साथ सम्मानजनक व्यवहार करें। लेकिन अफसोस, ऐसे अधिकारियों के प्रयासों को उनके अधीनस्थ ही पलीता लगा रहे हैं।
जिले में पनप चुकी ‘चढ़ावा संस्कृति’ अब महज भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि एक समानांतर अनैतिक व्यवस्था बन चुकी है। यह न केवल जनता को अपमानित कर रही है, बल्कि शासन-प्रशासन की साख को भी गहरा आघात पहुँचा रही है। अब समय आ गया है कि जिले की कर्मठ, ऊर्जावान और सख्त कार्यशैली के लिए जानी जाने वाली उपायुक्त कीर्तिश्री जी इस बेलगाम होती व्यवस्था पर कठोर कार्रवाई करें। जरूरत है ऐसे भ्रष्ट और लापरवाह कर्मियों की पहचान कर उन्हें दंडित करने की, जो चतरा जिले की छवि को बदनाम कर रहे हैं और प्रशासन के नाम पर जनता से खिलवाड़ कर रहे हैं। जनता अब न्याय और ईमानदारी की प्रतीक्षा में है। उपायुक्त महोदया से यही अपेक्षा है कि वे व्यक्तिगत रूप से इस मुद्दे की गंभीरता को समझें और एक सख्त अभियान चलाकर ‘बेलगाम बाबूगिरी’ पर लगाम कसें।