चतरा नगर परिषद में वादों की गूंज, जनता पूछ रही , शहर के लिए किसने क्या किया??

चुनावी मौसम में जागे नेता पांच साल चुप अब विकास की बड़ी-बड़ी बातें , चेहरों की भीड़ में सच्चा सेवक कौन??
चतरा(संजीत मिश्रा)। चतरा नगर परिषद में चुनावी बिगुल बज चुका है। चुनावी शतरंज की बिसात बिछ गई है, मोहरे सज चुके हैं और सियासी चालों का दौर तेज हो गया है। पैर छूने से लेकर जनसंपर्क और सोशल मीडिया तक हर ओर प्रत्याशियों की सक्रियता नजर आ रही है। हर कोई अपने नाम के आगे कर्मठ, संघर्षशील, जुझारू और ईमानदार जैसे विशेषण जोड़कर खुद को जनता का सच्चा सेवक साबित करने में जुटे है। राजनीतिक दल भले ही चुनाव को गैर-दलीय बताते हों, लेकिन अंदरखाने अपने-अपने समर्थित प्रत्याशियों के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिशें जारी हैं। असली परीक्षा 23 फरवरी को होनी है, जब फैसला मतदाता के हाथ में होगा। इस बार बैलेट पेपर पर न कमल का फूल होगा, न हाथ का निशान और न तीर-धनुष। ऐसे में मतदाता को चेहरे, चरित्र और शहर के विकास तथा समस्याओं को दूर करने में वर्षों के कार्यों को ही कसौटी बनाना होगा।
विकास के दावे बनाम जमीनी सच्चाई…
चुनावी मंचों से शहर के विकास के बड़े-बड़े वादे किए जा रहे हैं। सड़क, नाली, पानी, सफाई, रोशनी, रोजगार और डिजिटल सुविधा जैसे मुद्दों पर लंबी-लंबी घोषणाएं हो रही हैं। लेकिन सवाल यही है .. क्या इन वादों का कोई पुराना आधार भी है?
कई ऐसे चेहरे भी मैदान में हैं, जिनका शहर की समस्याओं -सामाजिक कार्यों या जनहित के मुद्दों से कभी सीधा जुड़ाव नहीं रहा। पिछले पांच वर्षों में जिनकी ओर से एक छोटा प्रयास भी दिखाई नहीं दिया, वे आज विकास का विस्तृत खाका पेश कर रहे हैं।
शहर में यह भी चर्चा जोरों पर है कि एक ऐसा प्रत्याशी, जिसकी पहचान कथित तौर पर नशे के कारोबार से जुड़ी बताई जाती रही है, अब शहर के विकास की बात करते हुए जनसमर्थन मांग रहा है। ऐसे में जनता के बीच यह सवाल गूंज रहा है । क्या विकास के नाम पर छवि बदली जा सकती है? जनता सब देख रही है। किसने संकट में साथ दिया, किसने सड़कों पर उतरकर आवाज उठाई, किसने सफाई, पानी और मूलभूत सुविधाओं के लिए प्रयास किया और कौन सिर्फ चुनावी मौसम में सक्रिय हुआ। अब फैसला मतदाता के हाथ में है। इस बार चुनाव सिर्फ चेहरों का नहीं, बल्कि काम और विश्वसनीयता का इम्तिहान है। चतरा की जनता तय करेगी कि शहर की बागडोर अनुभव और सेवा भावना को देनी है या सिर्फ वादों की चमक को।
चुनाव का शोर जितना तेज है, उतनी ही गहरी जिम्मेदारी मतदाताओं पर है। यह समय नारों, पोस्टरों और सोशल मीडिया की चमक और झूठे वादों से प्रभावित होने का नहीं, बल्कि बीते वर्षों के काम का हिसाब लेने का है। जो नेता सुख-दुख में साथ खड़ा रहा, जिसने सड़कों, पानी, सफाई, जनसमस्याओं और सामाजिक मुद्दों पर आवाज उठाई वही असली दावेदार है। जो सिर्फ चुनावी मौसम में सक्रिय हुआ, उसे जनता पहचानती है और 23 फरवरी को बैलेट पर सिर्फ नाम होंगे, लेकिन फैसला चरित्र, काम और भरोसे पर होगा। इस बार वोट किसी चेहरे को नहीं, बल्कि चतरा के भविष्य को देना है। जनता जागरूक है और यही जागरूकता तय करेगी कि शहर विकास की राह पर आगे बढ़ेगा या फिर वादों के जाल में उलझा रह जायेगा।
क्रमशः जारी ….





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