रांची/चतरा। कानून के रखवाले जब खुद कानून की सीमाएं लांघें, तो न्यायपालिका का हस्तक्षेप सख़्त होता है । ऐसा ही नज़ारा झारखंड हाईकोर्ट में देखने को मिला। मैट्रिक के एक छात्र को अवैध रूप से हिरासत में रखने के गंभीर मामले में हाईकोर्ट ने चतरा जिले के एक डीएसपी समेत टंडवा और लावालौंग थाना प्रभारियों पर कड़ा रुख अपनाया। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद एवं न्यायमूर्ति ए.के. राय की खंडपीठ ने तीनों पुलिस पदाधिकारियों को कोर्ट रूम में बैठाए रखने का आदेश दिया और अनुशासन बनाए रखने के लिए उनके मोबाइल फोन जब्त करा लिए। यह कदम अदालत की नाराज़गी और मामले की गंभीरता को साफ दर्शाता है।
क्या है मामला ..?
लावालौंग थाना क्षेत्र के एक मैट्रिक छात्र को 26 जनवरी की मध्य रात्रि पुलिस द्वारा उठाया गया। आरोप है कि पूछताछ के बाद छात्र को तत्काल मुक्त नहीं किया गया, बल्कि करीब 10 दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखा गया। छात्र को लावालौंग पुलिस द्वारा टंडवा थाना को सौंपा गया था। छात्र की मां ने बेटे की अवैध हिरासत को लेकर हैबियस कॉर्पस याचिका दाखिल की, जिस पर हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में पूछा
पूछताछ के बाद छात्र को तुरंत क्यों नहीं छोड़ा गया? यदि टंडवा थाना में कांड संख्या 26/2026 के तहत पूछताछ के लिए बुलाया गया था, तो क्या इसका उल्लेख केस डायरी में है? एक नाबालिग/छात्र को इतने दिनों तक थाने में रखने का कानूनी आधार क्या था? सुनवाई के दौरान चतरा एसपी को फोन पर कोर्ट से जोड़ा गया, जिन्होंने केस डायरी के अंश पढ़कर सुनाए। इससे यह स्पष्ट हुआ कि युवक से पूछताछ से जुड़ी प्रविष्टियां केस डायरी में दर्ज थीं, लेकिन हिरासत की प्रक्रिया और अवधि को लेकर अदालत असंतुष्ट दिखी। अगली सुनवाई 13 फरवरी हाईकोर्ट ने अनुसंधानकर्ता को केस डायरी प्रस्तुत करने का आदेश देते हुए मामले की अगली सुनवाई 13 फरवरी तय की है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि अगली तारीख पर सभी संबंधित पुलिस पदाधिकारी सशरीर उपस्थित रहें। सुनवाई समाप्त होने के बाद अदालत के निर्देश पर तीनों अधिकारियों के मोबाइल फोन लौटा दिए गए।





Leave a Reply